‘परे भूमि नहिं उठत उठाए...’: अस्ताचलगामी सूर्य की लालिमा पड़ते नंगे पांव दौड़े भरत, साढ़े तीन मिनट के दिव्य मिलन पर सजल हुईं तीन लाख आंखें

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- नाटी इमली के मैदान में उतरा त्रेतायुग, 3:36 मिनट के अलौकिक मिलन पर छलकीं लाखों आंखें, जयकारों से गूंजी काशी

 

- -      यादव बंधुओं के कंधे पर रघुकुल का भार, 483 साल पुरानी परंपरा के साक्षी बने लाखों श्रद्धालु

 

 

वाराणसी। ‘परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए...’ गोस्वामी तुलसीदास की अमर चौपाइयों की गूंज और ढलते सूर्य की स्वर्णिम रश्मियों के बीच गुरुवार को काशी का ऐतिहासिक नाटी इमली मैदान साक्षात त्रेतायुग के भाव-सागर में डूब गया। घड़ी की सुइयों ने जैसे ही शाम के नियत समय (4:40 बजे) को छुआ, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम और उनके प्राणप्रिय अनुज भरत का वह बहुप्रतीक्षित मिलन हुआ, जिसकी एक झलक पाने के लिए काशी की धरती पर तीन लाख से अधिक श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा था। महज 3:36 मिनट के इस दिव्य और अलौकिक दृश्य ने काल के चक्र को थाम दिया; चारों भाइयों के निष्काम भ्रातृत्व प्रेम को देखकर मैदान में उपस्थित शायद ही कोई ऐसा नेत्र रहा हो, जो सजल न हुआ हो।

 

 

 

दोपहर से ही छतों और मुंडेरों पर डटे रहे श्रद्धालु

 

 

काशी के प्रसिद्ध ‘लख्खा मेलों’ में सिरमौर माने जाने वाले 483 साल पुराने नाटी इमली के भरत मिलाप का आकर्षण ऐसा था कि दोपहर दो बजे से ही पूरा इलाका आस्था के रंग में रंग चुका था। मैदान की ओर जाने वाली हर संकरी गली, चौराहा, आसपास के भवनों की छतें, मुंडेरें और खिड़कियां भक्तों से खचाखच भरी थीं। जैसे-जैसे शाम ढल रही थी, वातावरण में कौतूहल और भक्ति का ज्वार बढ़ता जा रहा था। लाखों कंठों से एक स्वर में फूटते ‘सियावर रामचंद्र की जय’ और ‘हर-हर महादेव’ के गगनभेदी जयकारों से समूचा परिक्षेत्र गुंजायमान हो रहा था।

 

 

 

दौड़ते हुए आए भरत, प्रभु ने कलेजे से लगाया

 

 

शाम को जैसे ही अस्ताचलगामी सूर्य की लालिमा मैदान पर फैली, पुष्पक विमान रूपी भव्य मंच से प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण आगे बढ़े। ठीक उसी पल सामने से विरह की अग्नि में तप रहे अनुज भरत और शत्रुघ्न नंगे पांव दौड़ते हुए मंच की ओर लपके। प्रभु श्रीराम के श्रीचरणों के समीप पहुंचते ही भरत भक्ति और विह्वलता के अतिरेक में भूमि पर साष्टांग लेट गए।

 

 

कातर नयनों और कांपते हाथों से जब भरत लाख यत्नों के बाद भी भूमि से नहीं उठे, तब कृपासिंधु प्रभु श्रीराम ने झुककर उन्हें अपनी भुजाओं में समेट लिया और सीधे कलेजे से लगा लिया। उधर, लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी अश्रुपूरित नेत्रों के साथ परस्पर गले मिल गए। चारों भाइयों के इस आत्मिक और निश्छल मिलन को देख जनसैलाब भाव-विभोर हो उठा। चारों ओर से पुष्पवर्षा होने लगी और समूचा मैदान एक भावुक निस्तब्धता के बाद जयघोष से दहल उठा। वह साढ़े तीन मिनट की समय की सीमा से परे जाकर एक शाश्वत आध्यात्मिक अनुभूति में बदल गया।

 

 

 

काशीराज ने सौंपी स्वर्ण मुद्रा, जीवंत रही सदियों पुरानी परंपरा

 

 

अलौकिक मिलन के तुरंत बाद सदियों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन हुआ। परंपरा के अनुसार, काशीराज परिवार के कुंवर अनंत नारायण सिंह ने लीला के मुख्य व्यवस्थापक पं. अभिनव उपाध्याय को सोने की गिन्नी (स्वर्ण मुद्रा) भेंट कर इस ऐतिहासिक धरोहर का सम्मान किया। सूर्य के क्षितिज में पूरी तरह विलीन होने के साथ ही यह विहंगम लीला विश्राम की ओर बढ़ी, किंतु भ्रातृत्व प्रेम, त्याग और निष्ठा की जो अलौकिक छाप नाटी इमली के मैदान में छूटी, वह हर श्रद्धालु के अंतर्मन में सदा-सदा के लिए अंकित हो गई।

 

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