वाराणसी। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की प्राचीन धरोहर और पत्थरों के क्षरण को रोकने के लिए पूरे मंदिर ढांचे का नए सिरे से वैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा। मंदिर की बनावट, पत्थरों की मजबूती और शिखर पर जड़े स्वर्ण आवरण के संरक्षण के लिए आईआईटी मद्रास की विशेषज्ञ टीम आगामी 5 नवंबर से अत्याधुनिक उपकरणों के साथ विस्तृत सर्वे शुरू करेगी। इस तकनीकी परीक्षण का मुख्य उद्देश्य मंदिर के मूल पुरातात्विक स्वरूप से बिना किसी छेड़छाड़ के पत्थरों की आयु बढ़ाना और स्वर्ण शिखर को सुरक्षित रखना है।
हाल के दिनों में बंदरों की उछल-कूद के कारण मंदिर के मुख्य शिखर कलश और आसपास के हिस्सों से कुछ पत्थर टूटकर नीचे गिर गए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने स्थायी समाधान तलाशने के लिए आईआईटी मद्रास से संपर्क साधा। मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) विश्व भूषण मिश्रा के अनुसार, मंदिर के मुख्य गुंबद सहित आसपास के ढांचों पर स्वर्ण परत चढ़ी हुई है। ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए इस पूरे ढांचे की वैज्ञानिक जांच कराना आवश्यक हो गया था।
इससे पहले डॉ. अरुण मेनन के नेतृत्व में आईआईटी मद्रास की टीम ने 27-28 मई को मंदिर का प्रारंभिक निरीक्षण किया था। टीम ने 11 जुलाई को सौंपी अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि मंदिर परिसर के ढांचे काफी पुराने हैं, इसलिए इनके दीर्घकालिक संरक्षण के लिए विस्तृत तकनीकी अध्ययन जरूरी है।
प्रशासन ने सर्वे की लागत के रूप में 3 सितंबर को 18 लाख रुपये की राशि संस्थान को जारी कर दी थी। 5 नवंबर से शुरू होने वाले इस सर्वे में आधुनिक सेंसर और गैर-विनाशकारी परीक्षण (NDT) उपकरणों के जरिए मंदिर के पत्थरों की आंतरिक स्थिति की पड़ताल की जाएगी। सर्वे पूरा होने के बाद आईआईटी की टीम अपनी विस्तृत कार्ययोजना और अंतिम रिपोर्ट मंदिर प्रशासन को सौंपेगी।