पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल: 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा दांव पर, क्या फिर शुरू होगा कोई बड़ा 'रेस्क्यू मिशन'? आसमान से समुद्र तक राह में कई रोड़े...

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नई दिल्ली पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सीधे संघर्ष ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। लेकिन भारत के लिए यह संकट कहीं अधिक गहरा है, क्योंकि इस अशांत क्षेत्र में करीब 90 लाख से एक करोड़ भारतीय निवास करते हैं। युद्ध की इस विभीषिका के बीच इन नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भारत सरकार की नींद उड़ी हुई है। ये भारतीय न केवल वहां के विकास में योगदान देते हैं, बल्कि हर साल लगभग 40 बिलियन डॉलर का रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) भारत भेजते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

 

एयरस्पेस पर पाबंदी: निकासी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा

 

मौजूदा स्थिति बेहद नाजुक है। ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव के कारण एयरस्पेस (हवाई मार्ग) पर कड़े प्रतिबंध लगे हुए हैं। रक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिज्ञों का मानना है कि फिलहाल किसी भी तरह का 'इवैक्युएशन ऑपरेशन' (निकासी अभियान) शुरू करना संभव नहीं है। जब तक आसमान सुरक्षित नहीं होता, तब तक विमानों को भेजना जोखिम भरा है।

 

इतना ही नहीं, समुद्री मार्ग भी सुरक्षित नहीं रह गया है। चाबहार बंदरगाह के जरिए निकासी की संभावनाओं पर भी पानी फिरता दिख रहा है क्योंकि 'स्ट्रेट ऑफ होरमूज़' में जहाजों की आवाजाही पर हमलावर नजरें टिकी हुई हैं। ऐसे में भारत सरकार फिलहाल 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में है और हालात सामान्य होने का इंतजार कर रही है।

 

ऐतिहासिक अभियानों का अनुभव: 'ऑपरेशन सिंधू' और 'कावेरी'

 

भारत का इतिहास संकट के समय अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने में गौरवशाली रहा है। पिछले साल ही, 18 जून को भारत ने 'ऑपरेशन सिंधू' चलाया था, जिसके तहत संघर्ष क्षेत्र से लगभग 4,415 लोगों को सुरक्षित निकाला गया था। उस समय इजरायल से जॉर्डन और मिस्र के रास्ते भारतीयों को एयरलिफ्ट किया गया था, जबकि ईरान में फंसे लोगों को आर्मेनिया और तुर्कमेनिस्तान के जरिए बाहर निकाला गया था।

 

इसी तरह, साल 2023 में सूडान संकट के दौरान 'ऑपरेशन कावेरी' के माध्यम से भारतीयों की घर वापसी हुई थी। उस समय सऊदी अरब ने जेद्दा में एक ट्रांजिट सुविधा मुहैया कराई थी, जिससे रेस्क्यू ऑपरेशन आसान हो गया था।

 

खाड़ी युद्ध की यादें: जब 1.70 लाख भारतीयों को बचाया गया था

 

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और पूर्व राजदूत राजीव डोगरा बताते हैं कि भारत को युद्ध क्षेत्रों से लोगों को निकालने का व्यापक अनुभव है। 1990 के कुवैत-इराक युद्ध के दौरान भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा नागरिक हवाई रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया था। उस समय सड़क मार्ग से लोगों को जॉर्डन ले जाया गया और फिर एयर इंडिया की उड़ानों से देश वापस लाया गया। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि उस वक्त के मुकाबले आज का जोखिम कहीं अधिक तकनीकी और घातक है।

 

विदेशी नागरिकों के लिए भारत की दरियादिली

 

युद्ध केवल वहां फंसे भारतीयों को प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि भारत में मौजूद विदेशी नागरिक भी इसकी चपेट में हैं। उड़ानों के रद्द होने के कारण कई विदेशी पर्यटक और व्यवसायी भारत में फंस गए हैं। इसे देखते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक एडवाइजरी जारी की है:

 

·         जो विदेशी नागरिक अपने वीजा की अवधि बढ़ाना चाहते हैं, वे FRRO (फॉरेन रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस) से संपर्क करें।

 

·         भारत सरकार ने आश्वासन दिया है कि एयरस्पेस प्रतिबंधों के कारण फंसे लोगों को हर संभव कानूनी और प्रशासनिक मदद दी जाएगी।

 

आगे की राह: क्या होगा अगला कदम?

 

फिलहाल, विदेश मंत्रालय पल-पल की स्थिति पर नजर रख रहा है। जानकारों का कहना है कि 1 करोड़ लोगों को एक साथ निकालना न तो व्यावहारिक है और न ही आवश्यक, लेकिन जो लोग सीधे युद्ध क्षेत्र में हैं, उनकी पहचान की जा रही है।

 

भारत की रणनीति इस बार भी वही हो सकती हैपड़ोसी देशों (जैसे जॉर्डन या ओमान) को 'बेस' बनाना और वहां से सड़क या सुरक्षित हवाई गलियारे के जरिए नागरिकों को वापस लाना। लेकिन सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि ईरान और इजरायल के बीच का तनाव कितनी जल्दी कम होता है।

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