- पीएम मोदी ने तेल संकट और युद्ध के बीच देश को दिया आर्थिक संयम का संदेश
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, डॉलर पर बढ़ते दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर चिंताओं के बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi ने देशवासियों से बड़ा भावनात्मक और आर्थिक आह्वान किया है। उन्होंने लोगों से अगले एक साल तक सोना खरीदने से बचने और खाने में तेल का इस्तेमाल कम करने की अपील की है।
तेलंगाना के सिकंदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दुनिया इस समय अस्थिर दौर से गुजर रही है। युद्ध, सप्लाई चेन संकट और महंगे आयात ने भारत जैसे विकासशील देशों पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर दिया है। ऐसे समय में हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह देशहित को प्राथमिकता दे और विदेशी मुद्रा बचाने में योगदान दे।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को सोने के आयात पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। उन्होंने लोगों को याद दिलाया कि पुराने समय में जब देश संकट में होता था, तब लोग अपने गहने तक दान कर देते थे। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी ऐसी कोई स्थिति नहीं है, लेकिन यदि लोग एक साल तक सोना खरीदने से बचें तो यह भी देशभक्ति का एक रूप होगा।
उन्होंने खास तौर पर परिवारों से अपील करते हुए कहा कि यदि आने वाले महीनों में शादी-ब्याह या अन्य पारिवारिक कार्यक्रम हों, तो नए सोने के गहने खरीदने से बचें। पीएम मोदी ने कहा कि यह त्याग केवल व्यक्तिगत बचत नहीं बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ कदम होगा।
प्रधानमंत्री की यह अपील केवल भावनात्मक नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके पीछे गंभीर आर्थिक कारण हैं। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा सोना आयात करने वाले देशों में शामिल है। देश में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश सोना विदेशों से आता है। इसका मतलब यह है कि हर साल अरबों डॉलर केवल सोने की खरीद में खर्च हो जाते हैं।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, जब भारत ज्यादा सोना आयात करता है तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है। इससे भारतीय रुपये पर दबाव पड़ता है और उसकी कीमत कमजोर होने लगती है। अभी पहले से ही कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। ऐसे में भारत को तेल खरीदने के लिए पहले की तुलना में कहीं ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल और सोना भारत के सबसे बड़े आयातों में शामिल हैं। अगर दोनों पर खर्च तेजी से बढ़ेगा तो देश के चालू खाता घाटे यानी करंट अकाउंट डेफिसिट पर सीधा असर पड़ेगा। यही वजह है कि सरकार इस समय विदेशी मुद्रा बचाने को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में लोगों से पेट्रोल और डीजल का कम इस्तेमाल करने, जहां संभव हो वहां वर्क फ्रॉम होम अपनाने और गैरजरूरी विदेश यात्राएं टालने की भी अपील की। उनका कहना था कि छोटे-छोटे व्यक्तिगत फैसले मिलकर देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत दे सकते हैं।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर भी चिंता बनी हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक फरवरी 2026 तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 728 अरब डॉलर था, जबकि कुछ अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एजेंसियों के अनुसार यह स्तर घटकर करीब 691 अरब डॉलर के आसपास पहुंच गया है।
वहीं International Monetary Fund का अनुमान है कि 2026 में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़कर 84.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह भारत की जीडीपी का लगभग 2 प्रतिशत होगा। करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का सीधा अर्थ है कि देश से ज्यादा डॉलर बाहर जा रहे हैं।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि जनता सोने की खरीद कम कर दे तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा और रुपये को स्थिर बनाए रखने में मदद मिलेगी। इससे व्यापार घाटा भी घट सकता है और सरकार को वैश्विक संकट से निपटने के लिए ज्यादा आर्थिक ताकत मिलेगी।
भारत में सोने का महत्व केवल निवेश तक सीमित नहीं है। भारतीय समाज में सोना परंपरा, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। शादी-ब्याह से लेकर धार्मिक अवसरों तक सोने का विशेष महत्व है। अनुमान के मुताबिक भारतीय परिवारों, मंदिरों और संस्थानों के पास कुल मिलाकर 25 हजार से 30 हजार टन तक सोना मौजूद है। यह मात्रा दुनिया के कई देशों के आधिकारिक रिजर्व से भी ज्यादा बताई जाती है।
सरकार पहले भी लोगों को घरों में रखा सोना आर्थिक गतिविधियों में लाने के लिए कई योजनाएं शुरू कर चुकी है। इनमें गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसी योजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य यह था कि लोग भौतिक सोने की खरीद कम करें और निवेश के वैकल्पिक रास्तों को अपनाएं।
वैश्विक हालात ने भी सोने और तेल दोनों को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बना हुआ है। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव खत्म नहीं हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी रुकावट की आशंका से तेल बाजार में घबराहट बढ़ रही है। यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं।
दूसरी ओर वैश्विक महंगाई और ऊंची ब्याज दरों ने निवेश बाजार को अस्थिर बना दिया है। अमेरिका के फेडरल रिजर्व समेत दुनिया के कई केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनाए रखी हैं। इसका असर सोने की कीमतों और निवेश पैटर्न दोनों पर पड़ रहा है।
भारत में हर साल लगभग 700 से 900 टन सोने की खपत होती है और इसका लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात किया जाता है। अनुमान है कि देश हर साल सोने के आयात पर 50 से 70 अरब डॉलर तक खर्च करता है। यदि प्रधानमंत्री की अपील का व्यापक असर होता है और लोग बड़े पैमाने पर सोना खरीदना कम कर देते हैं, तो भारत को अरबों डॉलर की बचत हो सकती है।
आर्थिक आकलन बताते हैं कि अगर एक साल तक सोने की खरीद पूरी तरह रुक जाए तो देश करीब 70 अरब डॉलर यानी लगभग 6.84 लाख करोड़ रुपये तक की विदेशी मुद्रा बचा सकता है। वहीं यदि केवल 50 प्रतिशत खरीद कम होती है, तब भी लगभग 35 अरब डॉलर यानी 3.42 लाख करोड़ रुपये की बचत संभव है। यहां तक कि 25 प्रतिशत कमी आने पर भी करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की अपील को कई विशेषज्ञ “आर्थिक देशभक्ति” का संदेश मान रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार सीधे किसी पर प्रतिबंध नहीं लगा रही, बल्कि जनता से स्वैच्छिक सहयोग मांग रही है। यह अपील ऐसे समय आई है जब दुनिया युद्ध, महंगाई और आर्थिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। ऐसे में भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने और आर्थिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।