Iran- Israel War: ईरान युद्ध ने खाली किए अमेरिका के हथियार भंडार, चीन के लिए बचाकर रखी मिसाइलें भी खर्च, सैन्य रणनीति पर बढ़ा दबाव

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ईरान के साथ करीब 38 दिनों तक चले भीषण सैन्य संघर्ष ने दुनिया की सबसे ताकतवर मानी जाने वाली अमेरिकी सेना के हथियार भंडार पर गहरा असर डाला है। इस युद्ध में अमेरिका ने बड़ी संख्या में अत्याधुनिक और महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जिनमें वे हथियार भी शामिल थे जिन्हें भविष्य में चीन जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वी देशों के खिलाफ संभावित युद्ध के लिए सुरक्षित रखा गया था। अब अमेरिकी रक्षा तंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन हथियारों के तेजी से घटते स्टॉक को दोबारा भरने की बन गई है।

 

अमेरिकी रक्षा अधिकारियों और सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिका ने हजारों हाई-प्रिसिजन मिसाइलें दागीं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा लंबी दूरी तक मार करने वाली JASSM-ER स्टील्थ मिसाइलों को लेकर हो रही है। यह मिसाइल विशेष रूप से दुश्मन की एयर डिफेंस प्रणाली को चकमा देकर सटीक हमला करने के लिए विकसित की गई थी और इसे चीन के खिलाफ अमेरिकी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता रहा है। युद्ध के दौरान अमेरिका ने करीब 1100 JASSM-ER मिसाइलों का उपयोग किया।

 

इसके अलावा टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक 1000 से अधिक टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं। यही नहीं, 1200 से ज्यादा पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलें भी युद्ध में इस्तेमाल हुईं, जिनका उपयोग दुश्मन के मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने के लिए किया जाता है। इसके अलावा ATACMS और अन्य प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइलों का भारी उपयोग किया गया।

 

युद्ध की कुल लागत को लेकर भी चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। अनुमान है कि इस पूरे संघर्ष पर अमेरिका ने 28 से 35 अरब डॉलर तक खर्च किए। यदि इसे भारतीय मुद्रा में देखा जाए तो यह रकम प्रतिदिन लगभग 90 अरब रुपए बैठती है। यानी युद्ध के हर दिन अमेरिकी खजाने पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा। युद्धविराम को दो सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अमेरिका अब तक आधिकारिक रूप से यह नहीं बता पाया है कि कुल कितने हथियार और मिसाइलें इस्तेमाल हुईं।

 

पेंटागन ने केवल इतना कहा है कि 13 हजार से ज्यादा लक्ष्यों पर हमले किए गए। हालांकि रक्षा अधिकारियों का कहना है कि कई लक्ष्यों पर बार-बार हमला किया गया, इसलिए असली संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी बड़ी मात्रा में आधुनिक हथियारों का उपयोग हाल के वर्षों में किसी एक संघर्ष में पहली बार देखा गया है।

 

विशेष चिंता का विषय अमेरिका की टॉमहॉक और पैट्रियट मिसाइलों की घटती संख्या को माना जा रहा है। एक अध्ययन के अनुसार, युद्ध के बाद अमेरिका के पास लगभग 3000 टॉमहॉक मिसाइलें ही बची हैं। यह संख्या अमेरिकी सैन्य जरूरतों के हिसाब से काफी कम मानी जा रही है। स्थिति यह है कि युद्ध में जितनी टॉमहॉक मिसाइलें खर्च हुईं, वह अमेरिका द्वारा एक साल में खरीदी जाने वाली मिसाइलों से करीब दस गुना ज्यादा बताई जा रही हैं।

 

पैट्रियट मिसाइलों की स्थिति भी चिंताजनक है। एक पैट्रियट इंटरसेप्टर की कीमत करीब 40 लाख डॉलर होती है। अमेरिका ने वर्ष 2025 में लगभग 600 पैट्रियट मिसाइलें तैयार की थीं, लेकिन ईरान युद्ध में 1200 से ज्यादा इंटरसेप्टर इस्तेमाल हो गए। इससे अमेरिका के एयर डिफेंस नेटवर्क पर दबाव बढ़ गया है।

 

युद्ध के दौरान कुछ सैन्य अभियानों में अमेरिका को उपकरणों का नुकसान भी उठाना पड़ा। ईरान के अंदर फंसे एक पायलट को निकालने के मिशन में अमेरिकी सेना को दो MC-130 विमान और तीन हेलीकॉप्टर नष्ट करने पड़े। इनकी अनुमानित कीमत करीब 275 मिलियन डॉलर बताई गई है। शुरुआती दो दिनों में ही अमेरिका ने लगभग 5.6 अरब डॉलर के हथियार खर्च कर दिए थे, जिससे युद्ध की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

 

हथियारों की कमी पूरी करने के लिए अमेरिका को यूरोप और एशिया से भी अपने सैन्य संसाधनों को हटाकर मिडिल ईस्ट भेजना पड़ा। इसका असर उन क्षेत्रों की सुरक्षा तैयारियों पर भी पड़ा है। यूरोप में NATO की पूर्वी सीमा की सुरक्षा के लिए तैनात कुछ हथियारों और मिसाइल प्रणालियों की संख्या कम करनी पड़ी। वहीं एशिया में भी सैन्य संतुलन प्रभावित हुआ।

 

दक्षिण चीन सागर क्षेत्र से अमेरिका ने USS Abraham Lincoln कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को हटाकर मिडिल ईस्ट में तैनात किया। इसके साथ ही दो मरीन यूनिट्स भी वहां भेजी गईं। दक्षिण कोरिया में उत्तर कोरिया के खतरे से निपटने के लिए लगाए गए THAAD मिसाइल सिस्टम के कुछ इंटरसेप्टर भी पहली बार वहां से हटाए गए। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे एशिया में अमेरिका की सैन्य तैयारी कमजोर हुई है और चीन तथा उत्तर कोरिया जैसे देशों को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है।

 

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका को मिडिल ईस्ट में बड़े पैमाने पर सैन्य संसाधन लगाने पड़े हों। इससे पहले 2023 में इजराइल-गाजा संघर्ष और यमन में हूती विद्रोहियों के हमलों के बाद भी अमेरिका ने इस क्षेत्र में युद्धपोत और लड़ाकू विमान भेजे थे। पिछले वर्ष केवल हूती विद्रोहियों के खिलाफ अभियानों में ही अमेरिका को 1 अरब डॉलर से अधिक खर्च करने पड़े थे।

 

अब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के सामने सबसे कठिन चुनौती हथियारों का भंडार दोबारा तैयार करने की है। सीनेट की आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के वरिष्ठ सदस्य जैक रीड ने कहा है कि मौजूदा उत्पादन क्षमता को देखते हुए अमेरिका को अपने मिसाइल स्टॉक को पहले जैसा बनाने में कई वर्ष लग सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इसी तरह बड़े संघर्ष जारी रहे, तो अमेरिका की वैश्विक सैन्य रणनीति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

 

पेंटागन ने उत्पादन बढ़ाने के लिए लॉकहीड मार्टिन समेत कई रक्षा कंपनियों के साथ लंबे अवधि के समझौते किए हैं। सात साल के अनुबंधों के जरिए मिसाइल उत्पादन बढ़ाने की योजना बनाई गई है, लेकिन बजट और फंडिंग की समस्याओं के कारण कई परियोजनाएं अभी धीमी गति से चल रही हैं।

 

रक्षा विशेषज्ञ मार्क कैंसियन का कहना है कि अमेरिका के कुछ अहम हथियार पहले से ही सीमित संख्या में उपलब्ध थे और ईरान युद्ध ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। उनके मुताबिक यदि भविष्य में चीन या किसी अन्य बड़े प्रतिद्वंद्वी के साथ तनाव बढ़ता है, तो अमेरिका को अपनी सैन्य प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।

 

ईरान युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल मैदान में नहीं, बल्कि हथियार उत्पादन, सैन्य आपूर्ति और आर्थिक क्षमता की भी परीक्षा होते हैं। अमेरिका भले ही अभी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति बना हुआ हो, लेकिन लगातार युद्धों और भारी हथियार खर्च ने उसकी दीर्घकालिक सैन्य तैयारियों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

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