मानसून की रफ्तार पर ब्रेक, जून-जुलाई में भी झुलसाएगी गर्मी: यूपी-बिहार में जून में कम होगी बारिश, मौसम विभाग ने दी लंबी हीटवेव और कम बारिश की चेतावनी

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नई दिल्ली। देशभर में भीषण गर्मी से राहत की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को फिलहाल इंतजार करना पड़ सकता है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने संकेत दिए हैं कि इस बार मानसून की चाल धीमी पड़ गई है और जून-जुलाई जैसे बरसाती महीनों में भी कई राज्यों को हीटवेव का सामना करना पड़ सकता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, श्रीलंका के ऊपर बने कम दबाव और तेज तूफानी हवाओं के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल तट से कुछ दूरी पर अटका हुआ है, जिससे इसके आगे बढ़ने की गति प्रभावित हुई है।

 

आमतौर पर मानसून 1 जून तक केरल पहुंच जाता है, लेकिन इस बार इसकी एंट्री में देरी के आसार हैं। मौसम विभाग का कहना है कि अगले दो-तीन दिनों तक मानसून के आगे बढ़ने की संभावना बेहद कम है। पहले जहां इसके 26 मई तक भारत पहुंचने का अनुमान था, वहीं अब संभावना जताई जा रही है कि मानसून करीब एक सप्ताह बाद केरल तट पर दस्तक देगा। यानी शुरुआती अनुमान की तुलना में लगभग 10 दिन की देरी हो सकती है।

 

मौसम विभाग ने साफ किया है कि इस साल केवल मानसून की देरी ही चिंता का कारण नहीं है, बल्कि बरसात के महीनों में भी गर्मी का प्रकोप सामान्य से अधिक रह सकता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में जून और जुलाई के दौरान भी लू चलने की आशंका जताई गई है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि कई इलाकों में तापमान सामान्य से करीब 2 से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक रह सकता है, जिससे लोगों को उमस और तपिश दोनों का सामना करना पड़ेगा।

 

आईएमडी ने इस साल देश में सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान भी जताया है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस बार औसतन लगभग 78 सेंटीमीटर वर्षा होने की संभावना है, जबकि सामान्य बारिश का स्तर करीब 87 सेंटीमीटर माना जाता है। इससे पहले अप्रैल में 80 सेंटीमीटर बारिश का अनुमान लगाया गया था, लेकिन अब पूर्वानुमान को और घटा दिया गया है। यह स्थिति कृषि क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ाने वाली मानी जा रही है।

 

यूपी-बिहार में जून में कम होगी बारिश

 

विशेष रूप से मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में जून महीने के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की संभावना जताई गई है। वहीं राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ हिस्सों में सामान्य वर्षा हो सकती है। हालांकि देश के उन इलाकों में कम बारिश की आशंका ज्यादा है, जिन्हें मानसून का कोर जोनकहा जाता है। ये वे क्षेत्र हैं जहां खेती सबसे अधिक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है।

 

मानसून कोर जोन में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, विदर्भ, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश-बिहार के कुछ इलाके शामिल हैं। इन क्षेत्रों में बारिश की कमी सीधे तौर पर फसलों की पैदावार को प्रभावित कर सकती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बारिश कम रही तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होगी, जिससे किसानों की लागत बढ़ेगी और उत्पादन घट सकता है।

 

आम आदमी की रसोई पर भी पड़ेगा असर

 

कमजोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम आदमी की रसोई पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। सब्जियों, दालों और अन्य खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ने की आशंका है। उत्पादन घटने से बाजार में सप्लाई कमजोर होगी, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर दिखाई दे सकता है, क्योंकि खेती कमजोर पड़ने से गांवों में आय और खरीदारी दोनों घट सकती हैं।

 

बारिश कम होने पर बिजली की बढ़ेगी डिमांड

 

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण मांग में गिरावट आने पर ट्रैक्टर, बाइक और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री भी प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, यदि बारिश कम होती है और गर्मी अधिक पड़ती है, तो बिजली की मांग में भी भारी इजाफा होगा। एयर कंडीशनर, कूलर और पंखों के बढ़ते इस्तेमाल से बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही जलाशयों और बांधों में पानी का स्तर भी सामान्य से नीचे जाने का खतरा रहेगा, जिससे आगे चलकर पेयजल संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।

 

2025 में मई में केरल पहुंचा था मानसून

 

पिछले साल मानसून ने तय समय से पहले भारत में एंट्री कर ली थी। 2025 में मानसून 24 मई को ही केरल पहुंच गया था, जो सामान्य तिथि से करीब आठ दिन पहले था। इसके विपरीत इस बार स्थिति पूरी तरह उलट नजर आ रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अल-नीनो प्रभाव इस देरी की प्रमुख वजह है।

 

अल-नीनो से गर्म हो रहा प्रशांत महासागर का पानी

 

दरअसल, अल-नीनो ऐसी जलवायु स्थिति है जिसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे हवाओं के पैटर्न में बदलाव आता है और भारतीय मानसून प्रभावित होता है। जब अल-नीनो सक्रिय होता है, तब मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ जाती है और बारिश कम हो सकती है। मौसम विभाग का अनुमान है कि जून से अगस्त के बीच अल-नीनो का असर कमजोर से मध्यम स्तर तक बना रह सकता है।

 

मानसून में देरी से बढ़ गई लोगों की चिंता

 

इतिहास पर नजर डालें तो मानसून की केरल पहुंचने की तारीखें कई बार बदली हैं। मौसम विभाग के 150 वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक 1918 में मानसून सबसे जल्दी 11 मई को केरल पहुंचा था, जबकि 1972 में यह सबसे देरी से 18 जून को पहुंचा था। इस बार भी देरी ने मौसम वैज्ञानिकों के साथ किसानों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

 

अब देशभर की नजरें मानसून की अगली चाल पर टिकी हैं, क्योंकि यही आने वाले महीनों में खेती, महंगाई, बिजली और पानी की स्थिति तय करेगा।

 

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