कोडीन कफ सिरप घोटाला: सिस्टम में 'सिंडिकेट' की सेंध, जब रक्षक ही बन गए 800 करोड़ के नशे के कारोबार के पार्टनर, अधिकारियों पर भी गिर सकती है गाज

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लखनऊ। कोडीनयुक्त कफ सिरप की अवैध बिक्री और फर्जी बिलिंग से जुड़े बहुचर्चित मामले में अब बड़ी विभागीय कार्रवाई तय मानी जा रही है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की आंतरिक जांच में सहायक औषधि आयुक्तों और औषधि निरीक्षकों समेत आधा दर्जन से अधिक अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। सूत्रों के मुताबिक, शासन से अनुमति मिलते ही इन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से जांच को और तेज कर दिया है।

 

वाराणसी से गाजियाबाद तक फैला अवैध नेटवर्क

 

करीब दो महीने पहले FSDA ने नारकोटिक्स श्रेणी की दवाओं, विशेषकर कोडीन मिश्रित कफ सिरप के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया था। इस दौरान एक संगठित सिंडीकेट का पर्दाफाश हुआ, जिसकी जड़ें वाराणसी से लेकर गाजियाबाद तक फैली थीं। जांच में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि करोड़ों बोतल कफ सिरप केवल कागजों में ही खरीदी-बेची गईं। न तो दवा का वास्तविक निर्माण हुआ, न ही बाजार में बिक्रीसब कुछ फर्जी बिलिंग के सहारे दिखाया गया।

 

प्रति बोतल कमीशन और 800 करोड़ का खेल

 

FSDA की पड़ताल में खुलासा हुआ कि जिन फर्मों के नाम पर फर्जी बिल तैयार किए गए, उन्हें प्रति बोतल 10 से 15 रुपये तक का कमीशन दिया जाता था। इसी तरीके से अब तक 800 करोड़ रुपये से अधिक के अवैध कारोबार का अनुमान लगाया जा रहा है। इस नेटवर्क से जुड़े कई लोग बेहद कम समय में अकूत संपत्ति के मालिक बन गए और उनकी आर्थिक स्थिति में अचानक जबरदस्त उछाल देखने को मिला।

 

विभाग के भीतर ही साजिश के संकेत

 

सूत्र बताते हैं कि FSDA ने बेहद गोपनीय ढंग से विभागीय जांच कर सात से आठ अधिकारियों को चिन्हित किया है। इनमें दो से तीन सहायक औषधि आयुक्त और चार से पांच औषधि निरीक्षक शामिल बताए जा रहे हैं। इन अधिकारियों पर केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सिंडीकेट से मिलीभगत के गंभीर आरोप हैं। शासन की मंजूरी मिलते ही इसी महीने के अंत तक निलंबन और अन्य कठोर कदम उठाए जाने की संभावना है।

 

आलोक सिंह के बयान और ED की सक्रियता

 

इस मामले में बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह से जेल में हुई पूछताछ के बाद ED पूरी तरह अलर्ट हो गई है। आलोक के बयानों की सच्चाई जांचने के लिए ED ने कई फाइलें खंगालीं और उसकी कंपनियों के बैंक खातों, कॉल डिटेल रिकॉर्ड तथा अब तक मिले दस्तावेजों का मिलान किया। इसी प्रक्रिया में कई नए नाम और संदिग्ध लेन-देन सामने आए हैं।

 

संतोषजनक जवाब देने में नाकाम आरोपी

 

सूत्रों के अनुसार, आलोक सिंह और उसके सहयोगी अमित टाटा जेल में पूछताछ के दौरान कई अहम सवालों के स्पष्ट और संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। हालांकि एक दिन पूछताछ नहीं हुई, लेकिन एजेंसी की जांच की गति पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। मनी ट्रेल की बारीकी से जांच जारी है।

 

मास्टरमाइंड और सिंडीकेट की परतें

 

एसटीएफ की जांच में पहले ही यह सामने आ चुका है कि कफ सिरप तस्करी का मुख्य सूत्रधार शुभम जायसवाल था। उसने शैली ट्रेडर्सनाम से कंपनी बनाकर इस नेटवर्क को विस्तार दिया। इसी नेटवर्क की अहम कड़ी के रूप में आलोक सिंह और अमित टाटा का नाम उभरा था, जिन्हें बाद में गिरफ्तार किया गया।

 

कंपनियों के जरिए करोड़ों की फर्जी सप्लाई

 

जांच में यह भी सामने आया कि आलोक की दो और अमित टाटा की तीन कंपनियों के माध्यम से करोड़ों रुपये की कफ सिरप सप्लाई कागजों में दिखाई गई। बाद में ED ने इनके ठिकानों पर छापेमारी कर कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए। कॉल डिटेल और बैंक लेन-देन के आधार पर ED ने कई अन्य लोगों को भी चिन्हित किया है, जिनसे जल्द पूछताछ की जाएगी।

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