होली : रंगों का गाँव, और भीतर का सूना आँगन - डॉ. विनय कुमार वर्मा

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कभी होली गाँव में आती नहीं थी- गाँव खुद होली बन जाता था। फाल्गुन की हवा में जैसे कोई पुरानी बाँसुरी बजती थी और उस बाँसुरी की तान पर पूरा गाँव एक साथ मुस्कराता था। सुबह की पहली रोशनी के साथ ढोलक की थाप उठती, मंजीरा छनकता, और फाग गीतों की पहली पंक्तियाँ किसी एक घर की चौखट से निकलकर पूरे टोले में फैल जातीं। यह केवल गीत नहीं थे, यह गाँव की साँसें थीं-एक-एक स्वर में मिट्टी की महक, रिश्तों की गर्माहट और लोक-संस्कृति की जड़ों का रस होता था। उस समय होली का अर्थ रंग लगाना भर नहीं था; उसका अर्थ था दरवाज़ों का खुलना, मन की गाँठों का ढीला होना, बोलियों का मीठा हो जाना, और उन बातों का भी कह दिया जाना जिन्हें साल भर अब रहने दीजिएकहकर दबा दिया जाता था।

 

सुबह घर-घर फाग गाने का क्रम किसी कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, वह जीवन का स्वभाव था। टोली निकलती- कोई हारमोनियम उठाए, कोई ढोलक, कोई मंजीरा। किसी के कंधे पर गमछा, किसी की आँखों में नींद, पर होंठों पर फाल्गुन की धुन। होली खेले रघुबीर…” या आयो फागुन…” जैसी पंक्तियाँ सुनते ही घरों के भीतर से हँसी निकल आती। दरवाज़े अपने आप खुल जाते। हर घर उस टोली का स्वागत करता- कहीं गुड़-चना, कहीं ठंडाई, कहीं गुझिया की पहली खेप। महिलाएँ भीतर रसोई में लगी रहतीं, पर मन आँगन में घूमता रहता- कब टोली आए, कब रंग पड़े, कब कोई नई तुक छेड़े।

 

 

            दोपहर बाद जैसे गाँव का कोई केंद्र जाग उठता। शिवालय हो या अन्य मंदिर, या फिर चौपाल- लोग वहीं जुटते। पहले रामचरितमानस की कुछ चौपाइयाँ, दोहे; फिर भजन; फिर फाग की लहरें। यह क्रम केवल धार्मिक नहीं था, यह संस्कार का अनुशासन था। यह गाँव को याद दिलाता था कि उत्सव पहले शुद्ध होता है, फिर सुंदर। रंगों की उछाल से पहले शब्दों की मर्यादा, संगीत की मिठास और सामूहिक बैठकी का अपनापन।

 

                 कभी होली का स्वाद बाजार नहीं, घर देता था। गुझिया की सुगंध केवल मिठाई की नहीं, माँ, चाची, भाभी, दादी की उँगलियों की मेहनत की सुगंध थी। आटे की लोई पर हथेली की थपकी, खोया-मेवा-सूजी की भराई, किनारों पर उँगलियों की बारीक कारीगरी- इन सबमें एक घरेलू सौंदर्य था। पापड़-चिप्स भी कई घरों में घर के होते थे, धूप में सूखते, सहेजकर रखे जाते। रसोई केवल पकवान नहीं बनाती थी, वह रिश्तों का स्वाद गूँथती थी। आज भी कई घर इस परंपरा को सहेजे हुए हैं, और सच कहें तो वही घर होली की आत्मा को बचाए हुए हैं। किंतु धीरे-धीरे बाजार ने रसोई पर कब्ज़ा करना शुरू किया। सुविधाजनक पैकेट आए, रेडीमेड मिठाइयाँ आईं और हमने श्रम को सुविधा के नाम पर किनारे कर दिया। जब रसोई से श्रम हटता है, तो आँगन से आत्मीयता भी कम होने लगती है।

 

             सबसे बड़ा परिवर्तन रंगों में नहीं, संबंधों में आया है। पहले होली कई महीनों की दूरी को एक दिन में पाट देती थी। पड़ोसी का दरवाज़ा खुला रहता, रिश्तेदार अपने-आप आ जाते। कोई निमंत्रण नहीं, कोई औपचारिकता नहीं। आइए, बैठिएऔर साथ ही हमसे भी रूठे हैं क्या?” कहकर दिल की गाँठ खोल दी जाती। आज कई-कई होलियाँ निकल जाती हैं, पर पड़ोसी से बात नहीं होती। रिश्तेदार पास रहते हैं, पर नज़दीक नहीं आते। दरवाज़े बंद हैं, और मन भी। आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने हमें समय तो दिया है, पर संवेदना कम कर दी है। हम सुविधा में बढ़े हैं, पर आत्मीयता में सिकुड़ गए हैं।

 

              ...और जब संवेदना कम होती है, तो उत्सव का अर्थ बदल जाता है। होली जो मिलन का पर्व थी, वह कई जगह हुड़दंग का बहाना बन गई है। सड़क पर अश्लील गानों की तेज़ धुन, शराब के नशे में हंगामा, कपड़े फाड़ना, कीचड़ और नाली का पानी फेंकना- ये दृश्य उस सुंदरता पर धब्बा हैं जो कभी होली की पहचान थी। लोक-उत्सव में मस्ती हमेशा रही है, पर मस्ती और उच्छृंखलता में अंतर होता है। पहले की मस्ती में सामूहिकता थी; आज की मस्ती में कई बार हिंसक अहंकार है। रंग जो प्रेम का संकेत था, वह कई जगह किसी पर अधिकार जताने का माध्यम बन गया है।

 

नशा इस परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक बनकर उभरा है। शराब पीकर हुड़दंग मचाना, गाली-गलौज, झगड़ा, और फिर जब मिलने-जुलने का समय हो तो सोते रहना- यह होली की आत्मा को भीतर से चोट पहुँचाता है। नशा सहज आनंद को नकली बना देता है। वह मनुष्यता की सीमाएँ मिटा देता है और उत्सव को असुरक्षित बना देता है। जिस पर्व का उद्देश्य समरसता था, वह कई जगह भय और असहजता का कारण बन रहा है।

 

      इस बदलाव में बाजार की भूमिका भी कम नहीं है। बाजार उत्सव को अनुभव नहीं, उत्पाद बनाकर बेचता है। अब होली कई जगह महंगे रंगों, डीजे, स्पीकर, ब्रांडेड ठंडाई और ऑफरों का त्योहार बनती जा रही है। घर की गुझिया पुरानीलगने लगी, और पैकेट वाली स्टाइलहो गई। हमने रिश्तों को भी सुविधा की शर्तों पर सीमित कर लिया। घर-घर जाना अब दखलसमझा जाने लगा। रंग जो कभी टेसू, हल्दी और चंदन से बनते थे, वे अब केमिकल की चुभन बन गए। त्वचा जलती है, आँखें दुखती हैं, पर बाज़ार मुस्कराता है।

 

              गाँव और शहर का फर्क भी धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। जो विकृतियाँ कभी शहरों तक सीमित थीं, वे गाँवों में भी पहुँच गई हैं। मोबाइल, इंटरनेट और रील संस्कृति ने उत्सव को दृश्य बना दिया है। अब कई जगह होली पहले कैमरे के लिए खेली जाती है, फिर मन के लिए। सामुदायिक नियंत्रण कमजोर हुआ है और व्यक्तिगतता मजबूत। लोग साथ रहते हैं, पर साथ नहीं होते। अपार्टमेंट के बंद दरवाज़ों में होली कभी-कभी दो घंटे की पार्टी बनकर सिमट जाती है।

 

              फिर भी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है। अब भी कई गाँवों में फाग गाई जाती है। अब भी कुछ घरों में गुझिया उँगलियों से गढ़ी जाती है। अब भी कुछ बुजुर्ग रामचरितमानस की चौपाई के बिना होली को अधूरा मानते हैं। अब भी कुछ बच्चे ढोलक की थाप पर नाचते हैं। यह संकेत है कि परंपरा जीवित है, बस उसे जागृत करने की आवश्यकता है।

 

                   होली को बचाने का अर्थ केवल त्योहार बचाना नहीं है; यह सामुदायिक जीवन को बचाना है। यदि फिर से टोली निकले, यदि फिर से सामूहिक गान हो, यदि फिर से नशा-मुक्त मर्यादित होली का संकल्प लिया जाए, यदि फिर से पड़ोसी के दरवाज़े पर दस्तक दी जाए- तो रंग फिर रिश्तों तक पहुँचेंगे।

 

                होली का सच्चा अर्थ दिलों की गाँठ खोलना है। यदि इस दिन भी हम नहीं मिलते, तो फिर किस दिन मिलेंगे? यदि इस दिन भी हम नहीं बोलते, तो फिर कौन-सा अवसर शेष रहेगा? होली का मूल स्वभाव हमहै। जब मैंबड़ा हो जाता है, तब रंग केवल चेहरे पर रह जाते हैं; जब हमजागता है, तब रंग आत्मा तक उतर जाते हैं।

 

कभी होली गाँव को एक परिवार बना देती थी। आज आवश्यकता है कि हम फिर उसी दिशा में लौटें- जहाँ ढोलक की थाप पर मन धड़के, जहाँ मंदिर की चौखट पर गीत उठें, जहाँ रसोई की महक रिश्तों को जोड़े, जहाँ रंगों से अधिक प्रेम का महत्व हो। तभी होली फिर से रंगोत्सव नहीं, मानवोत्सव बनेगी और भीतर का सूना आँगन फिर से आबाद होगाl

- डॉ. विनय कुमार वर्मा

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